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Alka Singh


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बाबा रामदेव स्त्री वेश में ?-जागरण जंक्शन फोरम

Posted On: 8 Jun, 2011  
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जमीं की कैसी भी हो वकालत फिर नहीं चलती ….

Posted On: 7 May, 2011  
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मेरे ही शेर पढ़ के वो भी शायर हो गये …

Posted On: 28 Apr, 2011  
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आगे खिड़कियाँ भी आ जायेंगी …

Posted On: 15 Apr, 2011  
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फिर भागीरथ से कहो गंगा की धारा चाहिए !!!…

Posted On: 7 Apr, 2011  
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क्या गम है समंदर को बता भी नहीं सकता …

Posted On: 2 Apr, 2011  
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क्या बला का खूबसूरत दौर है ..

Posted On: 9 Jan, 2011  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

राजकमल जी नमस्कार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमारा मौलिक अधिकार है .आपकी टिप्पणी से मुझे कोई आपत्ति नहीं है .हर युग ,हर काल में में दो विचारधाराएँ रहीं हैं .कुछ लोग किसी बात को सही मानते हैं तो कुछ लोग गलत .आपको बाकई अंदाजा नहीं है की सरकार और पुलिस एक सही आदमी को भी पूरी तरह कैसे गलत साबित कर सकते हैं .....बात सिर्फ बाबा की नहीं है किसी एक घटना से कांग्रेस के प्रति कोई धारणा नहीं बनी है .इनके कारनामे सालों से लोग देख रहे हैं ...हिन्दू भावनाओं को आहत करना कांग्रेस ने इस लिए चुना है क्यों की उसे डर की मुस्लिम नेता कई बार अलग से दल बना कर इलेक्शन लड़ने की बात कर चुके हैं .ऐसे में जो परिद्रश्य होगा उससे ये सब जरूरी लगता है ..............वैसे भी इस देश में सही बात को कम और गलत बात को वाहवाही ज्यादा मिलती है एक बार अर्जुन सिंह ने कहा था की "राम ने फोन करके भा जपा को बताया होगा की वो अयोध्या में पैदा हुआ था" .....................साहित्यकार राजेन्द्र जी ने कहा था की "राम ने आतंकबादियों की फ़ौज खड़ी की थी और हनुमान सबसे बड़ा आतकवादी था "एक सिख ने राजेन्द्र को चुनौती दी थी कि वे किसी भी जगह पर अपनी पत्नी या बेटी को साथ लायें मै उन्हें एक मिनट में आतंकवादी सिद्ध कर दूंगा .लेकिन ऐसा कह कर उसने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया था .इन सारी बातों को दोहराने का उद्देश्य सिर्फ इतना है की जब भगवान तक को नहीं बक्शा जाता ये कोई पढ़े -लिखे समाज की निशानी है और इस तरह की बातों से राजनीती चलती है क्या ? वो तो सर्कार का बस नहीं चल रहा वरना यह भी कह देती की अन्ना और बाबा आई एस आई के एजेंट हैं और देश को कमजोर करने की कोशिश कर रहें हैं .

के द्वारा: Alka Singh Alka Singh

अलका जी जो रामदेव को गाली या उन पर आरोप लगा रहे हैं वो ऐसे इंसान हैं जो खुद तो कुछ कर नही सकते ,अगर दूसरा करता है तो उसमे कमी निकालते हैं.ऐसे लोग अगर समर्थन नहीं कर सकते तो अपना मुहँ तो बंद रख सकते हैं.मीडिया उनसे इसलिए खिलाफ है क्यों की उनके कपड़ों का रंग भगवा है. मनमोहन सिंह जो कश्मीर में सेना से अल्गाबदियों से नरमी बरतने को बोलते है,और रामलीला मैदान में पुलिस कारवाई को सही बता रहे हैं. मनमोहन सिंह को ये बोलते शर्म नहीं आई . कांग्रेस के युवा सम्राट राहुल बाबा दिखाई नहीं दे रहे. भट्टा-परसौल में जानने वाले राहुल बाबा को दिल्ली के रामलीला मैदान में ९०००० लोगों पैर हुए अत्याचार दिखाई नहीं देता . बाबा रामदेव का अनशन ना तो किसी जाति,धर्म या उनके निजी हित के लिए नहीं है वो देश हित के लिए है. इसलिए सभी को समर्थन करना चाहिए . अलका जी एक अच्छे लेख के लिए साधुबाद .

के द्वारा:

मित्र राजकमल जी .. क्या आपको अंदाजा है सरकार की ताकत का ... और अगर सरकार रामदेव को मारना नहीं चाहती थी तो इसतरह आतंकवादियों की तरह घुस कर वह कार्य क्यों किये जो पुलिस मैनुअल के भी पूरी तरह खिलाफ है .. वह भगदड़ मचती तो हजारो लोग मर जाते ... और उसी भगदड़ की आड़ में अगर रामदेव जी के साथ कोई अनर्थ हो जाता तो सरकार का काम भी निकल जाता और जनता को भी कोई ऐसा नेता नहीं मिलता जो इस तरह सरकार को खुली चुनौती दे सके.. और आप जिन कुछ नेताओं की बात कर रहे है वे सामान्य नेता नहीं है वे कैबिनेट मंत्री है जिनका स्थान प्रधानमंत्री के ठीक बाद आता है ...और ये बताइए की जब देश का प्रधानमंत्री ये बात कह रहे है की उसके सिवा कोई विकल्प नहीं था तो जाहिर है की ये सब सरकार ने ही पूरी तरह सोच समझ कर किया ...

के द्वारा:

अलका जी इस विषय पर बहुत अच्छे लोगो के मुख से बाते सुनी है मैंने टेलीविजन पर ... और ये लगता है की हम भले ही महिला पुरुष की समानता पर भाषण दे ले पर हमारा मन आज भी उसी विकृति में है .. मै समझ नहीं प् रहा की अगर रामदेव जी ने महिला के वस्त्र आत्मरक्षा के लिए पहन लिए तो उन्होंने कौन सा हास्यास्पद काम किया .. मानो उन्होंने कोई घ्रिडित काम कर दिया ..जिस देश में स्त्री को शक्ति का प्रतीक माना जाता है वहा नारी के वस्त्र मजबूरी में पहनने पर रामदेव के प्रति कुछ पुरुष वर्ग में ऐसा माहौल है जैसे उन्होंने कुछ अनैतिक कर दिया . हमारी मनोवृत्ति नहीं बदली है अभी तक नारी को कमजोरी , शर्मिंदगी और हिकारत की दृष्टि से देखने वाले दुश्सशन आज भी है .बहुत सही पंक्ति कही है आपने की स्त्री वेश धारण करना सबके बस की बात नहीं है ,बाबा ने कोई कायरता भरा काम नहीं किया और जो इस घटना पर हस रहे है वे नारी शक्ति का उपहास कर रहे है . और अलका जी आपने उन्हें पूरी शक्ति के साथ जवाब दिया है इसके लिए मै आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हु

के द्वारा:

आदरणीय अलका जी ....नमस्कार ! मेरा मकसद आप को तकलीफ पहुंचाना कतई नहीं था , हाँ जब मैं किसी पर कोई वयंग्य करता हूँ तब इस बात की परवाह बिलकुल नहीं करता हूँ ...... मैंने आपसे जो बाते टिप्पणियो के बारे में कही है उनमे से अधिकाँश बाते हमारे इसी मंच की एक पूर्व लेखिका अदिति जी ने समय -२ पर कही है .... उसके साथ कुछ बाते मैंने भी अपनी तरफ से जोड़ दी थी ..... हो सकता है उनकी बाते ही आपको अच्छी लगी हो जो मैंने अपनी तरफ से जोड़ी थी वोह आपको न भायी हो .... अब क्या करूं बंदे के पास जितनी अक्ल होगो वोह उतनी ही तो इस्तेमाल करेगा न ..... बाज़ार में पैसे लेकर खरीदने जाता हूँ घूम फिर कर खाली हाथ वापिस आ जाता हूँ .... लेकिन इस मंच पर बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है ...... अप जब अँधेरे में तीर चलाएंगी तो दूसरे तो बेसिर पैर की ही बाते करेंगे मेरी ही तरह .... अगर आप की बात में कोई वजन +सच्चाई होती तो आप उन ब्लागरो के नाम मुझको जरूर मेल करती .....

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

राजकमल जी ,नमस्कार मै क्षमा चाहती हूँ ,मेरी वजह से आप अकारण इतने आहत हुए,और मेरी इतनी क्या हस्ती जो आप और शाही जी जैसे सम्माननीय ,वरिष्ठ सदस्य पर कोई आरोप लगाऊं .संदेह को हमेशा इसी लिए बुरा माना गया है कि एक बार शुरू हुआ तो चैन -सकूं सब बहा ले जाता है .सच बताउं तो आपकी बेमतलब कि सोच से तकलीफ मुझे भी पहुंची है .मैंने बड़े चोर शव्द इस्तेमाल किया था उसके कहने का मतलब बड़े आदमी कि चोरी (रजा साहब )करने वाले बड़े चोर ही कहलायेगे न .मुझे तो यह भी नहीं पता कि आप स्वयं और आदरनीय शाही जी के किन लेखों की बात कर रहें हैं.क्यों की अपनी व्यस्तताओं के चलते मंच पर कम ही आ पाती हूँ .भाई अब भी कोई जिज्ञासा रह गयी हो तो जरूर बताना .आपका दिन शुभ हो .

के द्वारा:

aadrniy alka ji ....सादर अभिवादन ! मैं अल्प बुद्दी आप की बात बहुत देर बाद समझ पाया ,लेकिन जब बात असल में समझ में आई तो बहुत ही हंसी आई और मैं आपका भरम निवारण करने यहाँ पर चला आया ...... आपने जिन ब्लाग्स का जिक्र किया (इशारा किया ) है उनमे एक ब्लाग मेरा + दो ब्लाग आदरणीय शाही जी के है .... आपकी जानकारी के लिए बता दू की उन लेखो पर उनके मूल लेखकों भी टिप्पणिया भी है सकारात्मक रूप में ..... वोह सभी लेख मूल लेखकों से इजाजत लेकर लिखे गए है ..... अगर उनके इलावा आपको कोई जानकारी है तो आप मेल से बता सकती है ..... फिर देखेंगे की क्या किया जा सकता है . मेरे लिए वैसे भी कोई छोटा या बड़ा नहीं है ,kyonki एक व्यंग्यकार के लिए होना भी नहीं चाहिए ..... धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा:

अलका जी; जय हिंद ! सभी प्रतिक्रियाकार ; जय हिंद ! आपका लेख और आने वाली प्रतिक्रियाएं एक दायरे के अंदर की सोच से घिरी लगीं ! मुझे बिलकुल नहीं पता आप किन ३ रचनाओं का जिक्र कर रहीं हैं किन्तु मैं केवल सकारात्मक सोच का समर्थक हूँ इसीलिये कुछ संतोष दायक उद्धरण देना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ - हममें से अधिकांश सर आइजेक न्यूटन ,स्टीफन फ्लेमिंग, गेलीलियो, थामस अल्वा एडीसन , लुइ पाश्चर ,अल्फ्रेड जेनर आदि का नाम जानते हैं इसीलिये कि इनके नाम इनके दिए सिद्धांतों या आविष्कारों से जुड़े हैं किन्तु क्या ये अकेले ही तत्कालीन समय में ऐसा सोच सकने वाले थे ? नहीं ! अनेकों लोंगों के मन में ऐसे विचार इनसे पहले भी आये होंगे और समकालीन संमय में भी किन्तु श्री इन्हें ही मिला क्योंकि इन्होने इस श्रेय को पाने विचार / सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से सर्वप्रथम प्रस्तुत किया ! शायद जानकार अच्छा लगे कि चेचक के टीके का आविष्कार एक भारतीय बंगाली डाक्टर ने भी कर लिया था किन्तु ठीक वैसा ही फार्मूला बंगाली डाक्टर की शोध तैयार होने वाले दिन को रेडिओ समाचारों में अल्फ्रेड जेनर के नाम से स्थापित होने कि खबर आई थी ! इसका यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि जेनर ने बंगाली डाक्टर का फार्मूला चोरी किया ! एक और अधिक मेरे लिए पूर्ण विश्वसनीय घटना का विवरण देना चाहूँगा - मेरे मन में जल विद्युत् उत्पादन की एक नई युक्ति १९९० के आसपास आई ! मैंने तत्कालीन साधनों की सीमितता के चलते अपारंपरिक ऊर्जा विभाग के स्थानीय कार्यालय में जाकर अपना विचार प्रस्तुत किया किन्तु जिम्मेदार अधिकारियों ने मेरा मजाक उड़ाया और में चुपचाप वहां से चला आया .किसी से इस विषय में चर्चा नहीं की ना किसी को अपना पूरा माडल समझाया किन्तु कुछ ही सालों के बाद मेरे सिद्धांत की लगभग नक़ल को आस्ट्रेलिया और डेनमार्क की अलग अलग कंपनियों ने अपने नाम पेटेंट कराने में सफलता पा ली . इन दोनों का मुझसे कहीं से कोई सीधा संपर्क नहीं था तो मेरे सिद्धांतों की चोरी का तो प्रश्न ही नहीं उठता !नौकरी डाट काम जैसी प्लेसमेंट एजेंसी का आइडिया इनरनेट के भी आने से पहले मेनुअल खोलने का प्रस्ताव १९८१ में मैंने मेरे दोस्तों के सामने रखा था किन्तु उस समय मजाक उड़ाने लायक समझा गया ! इस सब में दोष मेरा ही है! मेरे अन्दर ना तो वह जूनून था ना ही उतना आत्मविश्वास कि मैं अपने विचारों को स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ता . आपने मेरा वर्षों पहले लिखा ' मेरा राज देश पर तो देश का दुनियां पर 'लेख अन्नाजी के आन्दोलन शुरू होने से पहले पढ़ा है और एकमात्र प्रतिक्रिया भी आपकी ही है शायद उसपर तो क्या अन्नाजी ने मेरा आइडिया चुराया! में ऐसा नहीं सोचता जबकि यह जानता हूँ की उस लेख की प्रति किरण जी को प्रस्तुत की गई थी ! इसका यह अर्थ नहीं कि विचारों की चोरी नहीं होती . होती होगी किन्तु मुझे प्रोफ़ेसर अश्वनी कुमार अवस्थी की कार्यशाला में सुपर नेतुरल माइंड [ अमेरिकी वैज्ञानिक शोध में सामने आया ईश्वर जैसी किसी सत्ता का वैज्ञानिक नाम ] की अवधारणा अधिक सही लगती है कि आपका और सभी का मष्तिष्क उस विशिष्ट प्राकृतिक महा मष्तिष्क से मानसिक तरंगों के माध्यम से जुडा रहता है .[जैसे धार्मिक अवधारणा अनुसार आत्मा और परमात्मा का संपर्क ]. जिस समय आपके मष्तिष्क को नवीन विचारों की अनुभूति होती है उसी समय और भी अनेक लोंगों को वैसी ही मानसिक तरंगों की प्राप्ति हो सकती है ! जहाँ तक प्रतिक्रियाओं का प्रश्न है तो वे सभी के लिए महत्वपूर्ण होती हैं .मेरे लिए भी हैं किन्तु मेरा प्रतिक्रिया लिखने का कोई नियम नहीं है . हाँ अधिकतर मेरे ब्लॉग पर आयी प्रतिक्रियाओं को मेरे प्रतिक्रिया देने से अलग रखने अपने ब्लॉग पर जाने से पहले अन्य ब्लॉग पढ़ता और जरुरी होने पर प्रतिक्रिया लिखता हूँ फिर अपने ब्लॉग पर आई प्रतिक्रियाएं देखता हूँ ताकि यदि कोई आलोचना भी हुई हो तो उसका असर मेरी लिखी जा रही प्रतिक्रिया पर ना पड़े ! पिछले कई दिनों से केवल अन्य सुधि लेखकों / लेखिकाओं को पढ़ने और प्रतिक्रियाएं लिखने के बाद मेरे अपने ब्लॉग पर जाने का समय ही नहीं बच रहा है ! [ इस बार आपके ब्लॉग पर ' प्रतिक्रिया में हुई इस ब्लॉग रचना ' को उचित समझें तो एडिट कर अपने ही ब्लॉग पर स्थान दीजिये ]

के द्वारा: charchit chittransh charchit chittransh

अलका जी सुप्रभात,, जिस मुद्दे की तरफ एवं जिनके विरुद्ध आपने ध्यान आकर्षित करने का प्रयाश किया है क्या अच्छा नही होता की आप उस रचना की चार पंक्तियाँ लिख भी देंतीं कम से कम मंच के सुधी पाठक भी ऐसे लेखकों से अवगत हो जाते ,,यह तो वही बात हुई आँखों ही आँखों में इशारा हो गया '' लेखन पर किसी व्यक्ति विशेष की शैली की हुबहू नकल करना स्वाभाविक प्रक्रिया है ''लेकिन किसी की रचना को कापी करना लेखन धर्म का अपमान है'' लेखन सदैव ही प्रथम स्वान्तः सुखाय ही होता है अपनी कृति से लेखक पहले स्वयं आनन्दित होता है फिर वह उसे पाठकों के स्म्क्छ रखता है इस विषय में मेरी तो यही राय है ''किसी से प्रभवित होना अलग बात है हर व्यक्ति का आदर्श कोइ न कोइ होता है जिसकी शैली शुरुवाती लेखन में सहायक सिद्ध होती है फिर बाद में हर लेखक अपनी स्वयम की शैली विकसित कर लेता है,, जहां तक रही बात कमेंटो की तो कोइ टिप्पणियों की परवाह ही क्यों करता है मेरी तो खुद की समझ में यह नही आता अरे कोइ प्रशंशक नही है तो टमाटर फेंकने वाला भी तो नही है यह स्थिति क्या कम है ,फिर आपका लेखन स्वयम आपको आनन्दित तो करता ही है ................जय भारत

के द्वारा:

आदरणीय अलका जी ...नमस्कार ! आपकी जिज्ञासा के लिए आपको कुछेक बाते बताना चाहता हूँ :- *आजकल हर किसी के पास कम समय है *कमेन्ट देना अपने आप में समय के हिसाब से बेहद खर्चीला है *मैं जिनको कमेन्ट देता हूँ उनको प्राथमिकता की सूचि में रखता जाता हूँ , जिनका जवाब मिलता जाता है उनको उस सूचि से हटाता जाता हूँ , और इस प्रकार यह प्रकिर्या चलती रहती है *और ऐसे में अगर लेखक उसका उत्तर न दे तो मेरे लिए बेहद मुश्किल हो जाती है *ऐसे लेखकों के लेखो पर बार -२ प्रतिकिर्या देना दिवार में सर मारने से भी मुश्किल कार्य है ..... *अपनी निजी जिंदगी में भी हम उसी के पास जाते है जो हमारे पास आता हो ,अगर न आ पाए तो अपने घर में हमारा उचित आदर मान तो करे कम से कम ..... मैं आपकी इस बात से सहमत नही की टिप्पणी से कोई लेना देना नहीं होना चाहिए ....मेरी शुरुआत इस मंच पर एक शायर के रूप में हुई थी ......लेकिन साथियो के हौंसला देने + यह कहने की मैं भी दूसरे विषयों पर लिख सकता हूँ मैं कुछ लिखने को प्रेरित हुआ , आज आपके सामने इस रूप में हाज़िर हूँ .... मुझमे छुपी हुई संभावनाए तलाशने वाले ब्लागरो का मैं आज भी दिल से कर्जदार हूँ धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

निखिल पांडे जी आपके लेख को देख कर लगता है कि आप गाँधी जी के बारे में सच भी नहीं सुन सकते .आपने सुभाष जी को तानाशाह तक कह डाला.तो फिर अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन ने अमेरिका में आज़ादी के लड़ाई बन्दूक के बल पर जीती, तो क्या वाशिंगटन भी एक तानाशह थे, वाशिंगटन के अगुआई वाला अमेरिका आज लोकतंत्र,सैन्यशक्ति ,आर्थिकशक्ति में मिसाल है. निखिल जी अगर सुभाष जी जीवित् होते, तो आज भारत में भर्ष्टाचार नहीं होता .कोई अन्ना हजारे लोकपाल बिल पास करने के लिए जंत्र -मंत्र पर अनशन नहीं करता ..निखिल जी अगर सुभाष जी जीवित होते तो १९४७ में देश का बटबारा न हुआ होता, देश में हिन्दू मुस्लिम दंगे भी न होते .देश बिभाजित न हुआ होता तो कश्मीर समस्या नहीं होती, तो आज कश्मीर के ४ युद्ध न हुए होते .अगर वो युद्ध न हुए होते हमारे देश हजारो सैनिक शहीद न हुए होते .१९६२ का चीन युद्ध भी शायद ही हारे होते.देश आतंकबाद से नहीं लड़ रहा होता. सुभाष जी के अगुआई में भारत एक महाशक्ति होता .अब बात गाँधी जी की, नेहरु जी से सरदार पटेल अच्छे प्रधानमंत्री साबित होते लेकिन गाँधी जी उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया.जबकि पटेल जी ने पूरे भारत का एकीकरण(कश्मीर मामले को नेहरु ने अपने हाथो लिया हुआ था) किया. आज फिर पटेल को याद क्यों नहीं किया जाता मै तो ये कहूँगा कि\" क्या पटेल जी भी राष्ट्रपिता से कम थे\" . पांडे जी कम से कम इतिहास को जरा ठीक से देखो आज जमाना बदल गया है.

के द्वारा:

अलका जी आपकी भावनाओं की मै क़द्र करता हु. लेकिन विचारो की इसतरह अभिव्यक्ति को सही नहीं मानता जहा तथ्यों की जानकारी न हो.... सुभाष जी व्यक्तिगत रूप से महान थे ठीक है पर अगर जीवित होते तो क्या करते ? क्या वे तानाशाह बनते ? या क्या उम्मीद करते है आप लोग ? वे कांग्रेस इसीलिए छोड़कर गए क्योकि वहा उनके विचारो को बहुमत नहीं था ...आजादी से ठीक पहले कांग्रेस और नेहरु बहुत शक्तिशाली हो चुके थे नेहरु के प्रभाव में कांग्रेस इस हद तक थी की 1942 के बाद गाँधी जी भी एक तरह से किनारे कर दिए गए थे ..वे केवल एक मुखौटा बनकर खड़े थे .. शारीरिक और मानसिक और कार्यकारी शक्ति की एक सीमा होती है ...उनकी भी थी ...आजादी के समय हुए समारोह तक में गाँधी जी उपस्थित नहीं थे ...उस समय वे नोवाखली में दंगे शांत करा रहे थे ..... ऐसे में तो सुभाष अगर रहते तो क्या करते? क्या वे सेना लेकर गृह युद्ध करते या कुछ और?.. 1939 में कांग्रेस से निष्काशन के बाद बोस अपने फारवर्ड ब्लाक के हो गए यद्यपि वे कांग्रेस में काम करना चाहते थे पर परिस्थितिया पूरी तरह प्रतिकूल थी ..दूसरी बात उस समय तक सुभाष चन्द्र बोस की अपील बंगाल तक केन्द्रित थी .. हा आजाद हिंद फ़ौज के प्रति तत्कालीन समर्थन देश व्यापी था ... इसमें संदेह नहीं जैसा की पीयूष जी ने कहा दोनों का ही पहला और आखरी प्रेम देश था . लेकिन गाँधी जी को भारत के सामजिक परिवेश की समझ किसी भी अन्य नेता से अधिक थी और उन्होंने उसे ध्यान में रखकर कदम आगे बढ़ाये .. हम किस हद तक मूर्खतापूर्ण चर्चाये कर सकते है क्या इसकी कोई सीमा है .. शुक्र है की आदरणीय मिश्र जी , शैलेश जी ,अरुणेश जी ,पीयूष जी ने सतर्कता बरती ..उनका आभार .. अन्यथा किसी ने गाँधी जी को उन्नीस -बीस के आंकड़े में रख दिया ..तो किसी ने उन्हें धृत राष्ट्र और अंग्रेजो का चाटूकार तक कह डाला.. आप और हम होते कौन है गाँधी और सुभाष की तुलना या समीक्षा करने वाले ... शर्म आनी चाहिए हमें क्योकि हमारी इस चर्चा पर गाँधी और सुभाष की आत्माओं को शर्म आती होगी .. अलका जी सुभाष चन्द्र बोस या ऐसा कोई भी अन्य स्वतंत्रता का सेनानी उतना ही सम्माननीय है जितना गाँधी जी उन्होंने जब अपने बीच तुलना नहीं की तो हम आप ये तुलना करने वाले कौन, गाँधी या सुभाष की तुलना करने की जगह अगर उन्हें समझने में लगाते तो आज कई गाँधी और सुभाष हमारे देश में पैदा हो चुके होते लेकिन आजाद भारत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने हमें इतना बुद्धिजीवी बना दिया है की हम सबकी समीक्षा करने में जुट गए है ... ऐसे में अगर कोई पश्चिम का लेखक गाँधी जी को जुवारी,, शारबी.. या समलैंगिक बता दे तो क्या फर्क पड़ जायेगा .. हम अपनी विस्तृत दृष्टिकोण से नई समीक्षा शुरू कर देंगे .. रितिका जी ने सुभाष और भगत को महान बताते हुए गाँधी जी को चाटूकार और ध्रितराष्ट्र तक कह दिया कभी उन्होंने ये जानने की कोशिश की कि.. सुभाष और भगत कि नजरो में गाँधी जी क्या थे ?.. क्या कभी उनके सम्बन्ध में उन्होंने सुभाष और भगत के विचारो को पढ़ा... ?ये वक्तव्य देने से पहले क्या उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन ,, भारत कि स्थिति और उसमे गाँधी जी के योगदान को पढने समझने कि चेष्टा कि ? अगर गाँधी जी का राजनीतिकरण किया गया तो उसके लिए आप गाँधी जी को ही क्यों दोषी मानते है ? ये तुलना किसलिए .. ? जिसे पूरा विश्व आज एक आदर और सम्मान की दृष्टि से देख रहा है उसे हम ही उन्नीस बीस पर तौल रहे है.... आपसे ये किसने कह दिया की गाँधी को सुभाष या भगत नहीं सुहाए.. प्रश्न व्यक्तिगत चरित्र का नहीं था बल्कि वैचारिक था और वह हम आप जैसे चरित्तर नहीं थे .क्योकि वे वैचारिक मतभेदों को मनभेद नहीं होने देते थे एक दुसरे का उतना सम्मान करते थे क्योकि वे जानते थे रस्ते अलग है पर मंजिल एक ही है... सुभाष चन्द्र बोस की इतनी अपील थी की वे जनता तक पहुच रखते थे पर वे जानते थे गाँधी की अपील भारत में सर्वव्यापी है और इसीलिए उन्होंने अपने आक्रमण से पूर्व सन्देश में सबसे पहले गाँधी जी का नाम लिया .. जब वे स्वयं उन्हें राष्ट्रपिता का स्थान दे चुके है .. फिर ये कौन ऊपर कौन नीचे की बात करना क्या उचित लगता है?क्या हम आप इतने सक्षम है की गाँधी और सुभाष का मूल्याङ्कन कर सके ?

के द्वारा:

सुभाष चन्द्र और महात्मा गांधी के बीच तुलना करना ठीक वैसा ही है जैसा लारा ओर सचिन के बीच....... इन दोनों के लिए क्रिकेट ही उनका भगवान है........ ओर इनका खेल ही इनकी पुजा.......... उसी तरह गांधी जी ओर नेता जी....... दोनों के लिए ये देश उनका भगवान था....... ओर उसको गुलामी से मुक्त करवाने की जंग उनकी पुजा....... दोनों मे सी किसी भी एक को ओर मैं तो ये भी कहता हूँ की इनहि को क्यों आजाद, भगत सिंह....... ओर अन्य सभी भी इसी श्रेणी मे आते है......... कोई भी किसी से कम नहीं......... पर ये इस देश का दुर्भाग्य है की यहाँ गांधी के नाम को लोगों ने राजनीतिक लाभ के लिए ऊंचा बना दिया......... ओर अन्य सभी को कहीं पीछे कर दिया................. अच्छे लेख के लिए बधाई..........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

वाह बहन जी बहुत खूबसूरत ब्लॉग है, जिस देश का जन्म ही बुराई, बेचैनी, बदमिजाजी, बदगुमानी, बेइज्जती, कुतर्कों, प्रतिशोध, क़त्ल इत्यादि से हुआ हो, तो वो बड़ा होकर भी क्या बनेगा, और अपने आसपास क्या माहौल देगा. जब जन्म से ही दामन में दाग है तो बड़े होने पर वो दाग और बड़ा और बदसूरत दिखाई देगा. वही हाल पाकिस्तान का है. जब सूरते हाल उसका ये है तो समझदार हमें ही होकर चलना होगा, और अपनी आँखे खोल कर रखनी होगी. परन्तु लगता है जब सियासी चश्मा लग जाता है, हमारी आँखें कुछ कमजोर हो जाती हैं. अंतिम शेर में आपने हम हिन्दुस्तानियों की सारी फितरत को उजागर कर दिया है, कि हम जलालत भी सह लेते हैं फिर भी लड़ाई को भरपूर दिल से टालने कि कोशिश करते हैं. शुक्रिया आपका सुंदर ब्लॉग के लिए.

के द्वारा:

अलका जी अभिवादन, "समस्या सारी यही है समाज आज भी स्त्री को हाड़-मांस की बेजान गुड़िया ही समझता है वैसे ही उससे पेश आना चाहता है और यही अब उसे स्वीकार नहीं ,अब उसे भी दुनिया का ज्ञान है ,अपने अस्तित्व की पहचान है वो भी स्वाभिमान के साथ जीना चाहती है .सम्मान देने के साथ सम्मान पाने की कामना भी रखती है यही पति को असहनीय है वो अब भी यही चाहता है की सब कुछ चुपचाप सहन करो ऐसा नही होगा तो मार खाओगी.निर्दोष होते हुए भी सारे आरोप खुद पर आते देख उसे समझ में नही आता है की क्या करे? फिर खुद भी अपने -आपको ही कसूरवार मान लेती है .एक निरपराधी को अपराधी मानने को विवश करना कहाँ तक उचित है ?" बहुत दर्द है आपके दिल में स्त्री जाति के लिए. तस्वीर का दूसरा पहलू भी होता है. कुछ बातें अपवाद स्वरुप भी होती है. हमारा नजरिया भी एक भूमिका निभाता है. नव वर्ष की बहुत-२ मुबारकबाद.

के द्वारा:

के द्वारा: राजेंद्र रतूड़ी राजेंद्र रतूड़ी

ईश्‍वर को किसी उच्‍च लोकस्‍थ सर्वशक्तिमान अधिष्‍ठाता के रूप में मानने पर तो यह सवाल स्‍वाभाविक है। लेकिन यह मान्‍यता हमारी परिकल्‍पना पर आधारित है। बचपन से जो हमारे मनोमष्तिष्‍क पर स्‍वरूप र्बठा दिया गया है। यथार्थ आत्‍म -बोध से निष्‍पत्‍त स्‍वरूप नहीं है। इस लिए बिना स्‍वरूप बोध , बिना उसे निजी तौर से जाने -पहचाने, के ईश्‍वर के अस्तित्‍व या उसके कार्य-व्‍यवहार संबंधी सवाल भी टिकाऊ नहीं है। ईश्‍वर का जब कुछ घटना-बढना ही नहीं है, कुछ बनना बिगडना ही नहीं है, तो कोई उसे माने या न माने उसकी सेहत पर क्‍या फर्क पडता है ? वह तो पूर्ण बताया जाता है। पूर्ण होगा तभी ईश्‍वर कहलाने का अधिकारी है। और पूर्ण से पूर्ण भी निकाल जाए तो भी पूर्ण ही बचता है। यह औपनिषिदिक कथन है- पूर्णमद: पूर्णमिदं.........।कहते हैं- निगम सेष सिव पार न पावहिं। वह ब्रह्मा को भी पलक के इशारे पर मच्‍छर और मच्‍छर को ब्रह्मा बना सकता है- मसकहिं करइ बिरंचि.....। जो इतना विशाल हो - नभ सत कोटि अमित आकाशा..। सैकडों करोडों और अनगिनत आकाशों के समान जो आकाश वाला हो, उसके बारे में हमारे अति सीमित मन-बुद्धि के सवालों की गति और उपयुक्‍तता कितनी ?

के द्वारा:

ईश्वरीय शक्ति की विवेचना कर पाना इतना आसान नहीं है............ कई बार हम चीजों के प्रति गलत नज़र रख लेते हैं इस लिए हम कुछ व्यथित हो जाते हैं........... ये सत्य है की इंसान को अपने कर्मों का फल इस जनम मे ही भुगतना पड़ता हैं........... पर कई विलक्षण प्रतिभा के धनी ऐसे भी होते हैं जिन का कोटा इस जनम मे पूरा नहीं हो पाता तो उनको फिर जनम लेना पड़ता है......... एक ऐसे ही घटना से जिसमे एक 4 साल का लड़का जो की अपने माता पिता का एकलौता था की मृत्यु से व्यथित होकर मैंने एक ज्ञानी पुरुष से प्रश्न किया की आखिर उस बच्चे का क्या कसूर था......... तो उन्होने कहा की उस बच्चे का कोई कसूर नहीं सजा तो उसके माता पिता के कर्मों की थी............. बच्चा तो निमित्त मात्र था............ यदि सजा बच्चे को मिलनी होती तो उसकी मृत्यु तब होनी थी जब वो इस संसार से जुड़ जाता अभी तो वो जनता ही नहीं था की क्या जीवन है ओर क्या मृत्यु ................ प्रथम रचना के लिए बधाई..............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani




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